रतन टाटा: सादगी की मिसाल और दिखावे से दूर रहने वाले शख़्स की पूरी कहानी

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रतन टाटा: सादगी की मिसाल और दिखावे से दूर रहने वाले शख़्स की पूरी कहानी
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रतन टाटा के बारे में उनके एक मित्र ने एक बार कहा था कि उन्हें कभी किसी ने पूरी तरह से नहीं जाना, वो बहुत गहराइयों वाले आदमी हैं.

वो अकेले वीआईपी थे जो अकेले चलते थे. उनके साथ उनका बैग और फ़ाइलें उठाने के लिए कोई असिस्टेंट नहीं होता थासन 1992 में इंडियन एयरलाइंस के कर्मचारियों के बीच एक अद्भुत सर्वेक्षण करवाया गया.

''कुत्तों से उनका प्यार इस हद तक था कि जब भी वो अपने दफ़्तर बॉम्बे हाउस पहुंचते थे, सड़क के आवारा कुत्ते उन्हें घेर लेते थे और उनके साथ लिफ़्ट तक जाते थे. इन कुत्त्तों को अक्सर बॉम्बे हाउस की लॉबी में टहलते देखा जाता था जबकि मनुष्यों को वहाँ प्रवेश की अनुमति तभी दी जाती थी, जब वो स्टाफ़ के सदस्य हों या उनके पास मिलने की पूर्व अनुमति हो.

बचपन में जब परिवार की रोल्स-रॉयस कार उन्हें स्कूल छोड़ती थी तो वो असहज हो जाते थे. रतन टाटा को नज़दीक से जानने वालों का कहना है कि ज़िद्दी स्वभाव रतन की ख़ानदानी विशेषता थी जो उन्हें जेआरडी और अपने पिता नवल टाटा से मिली थी. टाटा की जवानी के उनके एक दोस्त याद करते हैं कि टाटा समूह के अपने शुरुआती दिनों में रतन को अपना सरनेम एक बोझ लगता था.

उधर उनकी माता ने तलाक़ के बाद सर जमसेतजी जीजीभॉय से विवाह कर लिया. रतन को उनकी दादी लेडी नवाज़बाई टाटा ने पाला. रतन के नेतृत्व में तीन सालों के अंदर नेल्को की काया पलट हो गई और उसने लाभ कमाना शुरू कर दिया. सन 1981 में जेआरडी ने रतन को टाटा इंडस्ट्रीज़ का प्रमुख बना दिया. टाटा के जीवनीकार केएम लाला लिखते हैं कि ‘जेआरडी... नानी पालखीवाला, रूसी मोदी, शाहरुख़ साबवाला और एचएन सेठना में से किसी एक को अपना उत्तराधिकारी बनाने के बारे में सोच रहे थे. खुद रतन टाटा का मानना था कि इस पद के दो प्रमुख दावेदार पालखीवाला और रूसी मोदी होंगे.’

आज टाटा की ग्लोबल बेवेरेजेस दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी चाय कंपनी है. इसके बाद उन्होंने यूरोप की दूसरी सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कंपनी ‘कोरस’ को खरीदा. शुरू में ये कार असफल रही और रतन ने इसे फ़ोर्ड मोटर कंपनी को बेचने का फ़ैसला किया. जब रतन डिट्रॉएट गए तो बिल फ़ोर्ड ने उनसे पूछा कि उन्होंने इस व्यवसाय के बारे में पर्याप्त जानकारी के बिना इस क्षेत्र में क्यों प्रवेश किया?

उनका तर्क था कि रतन के कई महंगे विदेशी अधिग्रहण उनके लिए महंगे सौदे साबित हुए. ‘टाटा स्टील यूरोप’ एक सफ़ेद हाथी साबित हुआ और उसने समूह को भारी कर्ज़ में डुबोया.एक वित्तीय विश्लेषक ने कहा, ‘पिछले दो दशकों में भारतीय व्यापार में सबसे बड़े अवसर दूरसंचार में था, लेकिन रतन ने कम से कम शुरुआत में इसे गँवा दिया.’

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